ज्ञान और कर्म की समानता

 ज्ञान और कर्म की समानता



​अक्सर लोग समझते हैं कि ज्ञान का अर्थ केवल पढ़ना है और कर्म का अर्थ केवल काम करना। लेकिन एक ज्ञानी व्यक्ति जानता है कि बिना कर्म के ज्ञान व्यर्थ है और बिना ज्ञान के कर्म अंधा है। जब आप सही समझ (ज्ञान) के साथ अपना कर्तव्य (कर्म) करते हैं, तो वह 'कर्मयोग' बन जाता है।

​2. संतुलन ही सफलता की कुंजी है

​जीवन में केवल विचार करते रहना (ज्ञान) आपको कहीं नहीं ले जाएगा, और बिना सोचे-समझे भागदौड़ करना (कर्म) केवल थकान देगा। सफलता वहीं है जहाँ आपकी बुद्धि और आपके प्रयास एक ही दिशा में हों।

​3. शांति का मार्ग: 'मैं' और 'मेरा' का त्याग

​शांति बाहर नहीं, भीतर की स्थिति है। अशांति का मुख्य कारण 'मोह' और 'अहंकार' है:

​'मैं' (अहंकार): जब हम कर्ता होने का घमंड छोड़ देते हैं।

​'मेरा' (ममता): जब हम परिणामों या वस्तुओं से अत्यधिक जुड़ाव छोड़ देते हैं।

​जैसे ही ये दो बोझ हटते हैं, मन स्वतः ही शांत हो जाता है।

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